मेरी हर कविता उसी से शुरू हुई

जिसने मेरी नजरों को पल भर के लिए बांधा था

जीवन का सबसे बड़ा भ्रम प्रेम

सबसे बड़ा छल मोह

खुद को समर्पित करना सबसे बड़ी भूल बन गया

क्योंकि वह फूल बनकर कांटो सा तन गया

समझदारी की पहली ठोकर

लड़खड़ाते हुए गिरने का पहला अनुभव

अनुभवहीन क्या समझेगा

इन पुतलियों पर चढ़ी परतों ने देखते ही न दिया था

सत्य का स्वरूप तो कुछ और ही था

शीशे में खुद को देखा

नियति पीछे से मंद मुस्कान लिए मुझे घेर रही थी

मेरा दुख, मेरी खुशी,मेरा हंसना, मेरा रोना,

मेरे अरमान,मेरे सपने,मेरी छाया, मेरी पहचान,

हर जगह "मैं " से ही भरी थी

इतनी सीमित संकीर्ण दुनिया मेरी नहीं थी

इसे पहचानने में सालों गवा दिए

किस ओर बढ़ रही थी और किसे लिए हुए?

क्या वह मेरा था?

जिसे जकड़े बैठी थी

वह मेरा है, सिर्फ मेरा है और मेरा ही रहेगा

यही भ्रम पाले थी

शरीर को तेज जकड़ने से मन पहले मुक्त हो जाता है

फिर, वह वापस कभी नहीं आता

इतनी छोटी सी दुनिया नहीं है मेरी

अपने होने का कारण समझना होगा

व्यष्टि से समष्टि की ओर बढ़ना होगा

मेरी दुनिया का विस्तार अनंत है

मुझे नया संसार चुनना होगा

                  डॉ संगीता 

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