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अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

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  निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर हम सभी आभासी माध्यम से जुड़कर मातृभाषा के प्रति जागरूकता को बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहे हैं।"अपनी माटी अपना देश अपनी भाषा अपना वेश"अनीश कुमार गुप्ता जी की यह रचना है। जो हमें अपनी भाषा में अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करती है।इसी सम्बन्ध में हम देखते हैं कि हमारे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जी ने भी कहा है कि "जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है वह उन्नत नहीं हो सकता।"           सीवी रमन जी ने भी कहा है कि "हमें विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में ही देनी चाहिए।अन्यथा विज्ञान एक ऊंचे स्तर की गतिविधि बनकर रह जाएगा। यह एक ऐसी गतिविधि नहीं होगी जिसमें सभी लोग भाग ले सकें।" हमें इस विषय में सोचने की भी आवश्यकता है। प्रत्येक भाषा एक धरोहर है और भाषा विविधता मानवता की सबसे बड़ी ताकत है।इसमें कोई संदेह नहीं है। एली विजेल ने कहा है कि "भाषा जीवित चीज हैं,वह बदलती हैं,वह बढ़ती हैं,वह मरती हैं।"       इसलिए हमारी मातृभाषाओं का संरक...

कहानी सा (like story )

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सिर पर कोई बोझ सी तुम्हें लेकर कब से चल रही हूँ। तुम एक बार अपना बोझ खुद तो उठा कर देखो.. थक जाओगे थोड़ी ही दूर चलकर। मिताली की ननद ने उसे अपने पति की बेरुखी को जताने का संकेत किया था ताकि वो भी जान सके कि जिस पुरुष के गले उसे बांधा गया वो बंधन उसका ही गला  घोंट रहा था। लेकिन क्या कर सकते थे रिश्तों से निकलना इतना आसान कहाँ होता है वो भी एक निम्न वर्गीय महिला के लिए। मिताली तो उसकी शादी के समय कोई राय नहीं रख सकती थी... वो भी तो नई -नई आयी थी। उसने अपनी ननद को समझा बुझा कर उसके पति के पास भेजना चाहा। पर, वह सफल न हो सकी। अपने बीते हुए कल की ओर देखते हुए नेहा कहने लगी-एक बार मुझे लगा था कि शायद  मैं प्यार में हूँ... पर मैं पूरे होश में रही मेरा दिल दिमाग़ कंट्रोल में आ गया... मैं लौट रही हूँ उस ओर से जिधऱ कभी नहीं जाना... अगर आगे जीवन में मैं अगर किसी के लिए आराध्य भाव रख कर प्रेम में पड़ी तो मेरा जीवन सफल हो जायेगा... प्रेम बहुत बड़ी नेमत है हर किसी की किस्मत में प्रेम नहीं मिलता... ह्रदय कोई सितार सा है वीणा सा है कोई भी तार ढीला हो या टूट जाए तो कितनी भी कोशिश करें कोई...मध...

बंधन

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 रक्षा सूत्र और मंगलसूत्र जिसके मजबूत ना हो उसकी और कोई भी नजर उठा सकता है हर जिसके मजबूत हूं उसकी और कोई नजर उठाने की हिम्मत नहीं करता जिनके यह दोनों मजबूत नहीं होते उन्हें अपनी रक्षा खुद करनी होती हैरि। रिश्ते कभी भी किसी की मेहरबानी से नहीं चलते इसके लिए रिश्ते में बंधे दो  लोग स्वीकार और समर्पण से ही करते हैं। मालती की बहन रोहिणी ने बड़े ही रूआँसे ढंग से अपनी बहन को कहा- मैं अब वहाँ कभी नहीं जाउंगी। बीच में ही रोकते हुए मालती बोल पड़ी.. चुप रहो... कभी दुबारा ऐसा मत कहना। चेतावनी भरे स्वर से रोहिणी सहमी तो पर चुप नहीं हुई। रोते हुए उठ कर बाहर लॉन में जा पहुंची।           कभी कभी ऐसा लगता है अब एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाऊँगी... मन इतना हार जाता है, दिल इतना बैठने लगता है कि साँस लेना भी मुश्किल होने लगता है। ऐसा लगता है कि कोई निःस्वार्थ अपनापन जताने वाला, प्यार से सहलाकर गले लगाने वाला, माथे को चूम कर कहे मैं हूँ तुम्हारे साथ तुम्हें थकने नहीं दूंगा... इतना मजबूत बनते बनते सब कुछ बिना किसी को बताये सहते हुए थक गई हूँ झूठी म...

कभी -कभी

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ट्रैफिक के बीच कुछ ऐसा देखा मैंने की जुबाँ को जैस पक्षाघात सा हो गया हो ...एक माँ के दो बेटे  जिनके कन्धे को अपना सहारा बनाने के लिए माँ  ने कदम बढ़ाये पर वो गिर पड़ी ।उसके कण्ठ  ने जैसे स्वरों का मार्ग अवरुद्ध कर दिया हो ..उसकी आँखें क्षण भर के लिए जैसे अपने बेटों से उत्तर पाने के लिए  उत्सुक हुई हों... पर निराशा से नत आँखों में उत्तर साफ दिखने लगा ,कि बेटों ने माँ को सहारा क्यों नही दिया.....तबतक एक बेटे ने माँ को झटके से उठाया मुझे क्षण भर में ही स्वयं के अनुमान पर आशंका हुई ,इसी क्षण भर में ही उस बेटे ने अपनी माँ को दस गुना वेग से जमीन पर पटका ।मैं स्तब्ध ... ये क्या हुआ ? वहीं दूसरे बेटे ने उसी दस गुने वेग से माँ पर गालियों की बौछार की 'ई!!!साली अइसे  ना मरी..... अरे...ई ..साली सब खाइ के मरी'  इतने अपशब्द..... मैंन किसी  को न कहते देखा है ..न सुना है।मुझसे न जाने क्यों  बस मे बैठा नही गया जैसे ही बस आगे बढ़ी मेरे कदम  भी आगे बढ़े और मैं नीचे उतर आइ उन बेटों का पशुवत् व्यवहार का कारण जानने के लिए... मुझे जो उत्तर मिला वह.....     ...

अपने

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  जिंदगी.... जिंदगी में हर कोई अपना नहीं बन कर रहता और हर कोई पराया भी नहीं होता। जैसे-जैसे हम एक दूसरे को समझने लगते हैं अपने आसपास जुड़ने लगते हैं हम जान पाते हैं कि हम किसी के लिए इतने भी महत्वपूर्ण नहीं होते कि जितना हम स्वयं को समझते हैं ।व्यक्ति हमसे जुड़ता है ।बात करता है। व्यवहार रखता है । वक्त पर काम आता है लेकिन वह सब कुछ नहीं हो जाता ।कहीं ना कहीं वह आपसे एक अलग अपनापन जो है वह नहीं रख पाता है जो आप चाहते हैं कि अपनेपन से वह भरा रहे हमेशा ऐसा नहीं होता है। वहीं यदि हम देखें तो कई प्रकार के लोग ऐसे होते हैं जो एक दूसरे से सिर्फ और सिर्फ इसलिए जुड़ते हैं कि उनका कार्य संपन्न हो सके। कार्य सिद्ध हो सके। वह अपने मन मुताबिक काम करवा सके या कर सके या आपसे कोई फायदा ले सके कि आपका फायदा नुकसान उनसे जुड़ा रहता है।        वह व्यक्ति तब तक तो वह आपके साथ रहते हैं और अपना फायदा निकलने के बाद अपना काम निकालने के बाद आपको उस प्रकार से बाहर करते हैं जैसे आप कभी थे ही नहीं।अपने जीवन से या अपने व्यवहार से अपने जान पहचान से संपर्क से इस प्रकार से अलग करते हैं कि आप कभ...

प्रेम पराजित होता है क्या?

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 प्यार वो कभी नही हो से सकता जिसे आप अपने सुकून में ही याद करें.... प्यार वो है जो बड़ी से बड़ी तकलीफ मे  भी आपकी एक आवाज दिल को राहत दे जाए....जीवन में प्राण और प्रेम दुबारा नही पाया जा सकता....ये दोनों एक बार जाने के बाद वापस नही आते...मैंने हमेशा उस बात को प्राथमिकता दी है जो अनमोल है जो दुबारा नही पाया जा सकता.... पर मेरे साथ हमेशा यही रहा है कि मै सबकुछ हाथ से निकलते हुए देखती रहूँ....परिवर्तन प्रकृति का नियम है पर प्रेम पर यह लागू नही होता।प्रेम के तो अपने अलग ही नियम कानून हैं... जख्म भरने में समय लगेगा , सालों की दवा एक दिन में थोड़े ही खाई जा सकती है। उपभोग की वस्तु बनकर रह जाना कितना तकलीफ़देह है, इसे शब्दों में तो नहीं बताया जा सकता।        दिल में बसी कोई मूरत टूटती नहीं धूमिल पड़ जाती है समय के साथ। कोई क्यों इतना करीब आ जाता है कि उससे दूर होना मुश्किल होने लगता है। जिसके लिए दिल में अपार प्रेम और समर्पण हो वो अगर आपसे छल करने लगे तो बहुत तकलीफ होती है। उस इंसान के पास हर कोई है अपनों के बीच खुशियों से भरा हुआ उसे तो इतनी भी फुर्सत नहीं म...

रिश्ता यूं होता

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मीता तुमने मुझे बताया क्यों नहीं तुम इतनी तकलीफ़ में थी। सब कुछ अकेले सहना जरूरी था इतना कहते कहते वह लड़खड़ा कर खुद ही गिर पड़ी। मीता की तकलीफ़ क्या कम थी जो आज काजल भी इतनी बुरी हालत में दिख रही है। उसके मासूम से चेहरे को अपने नर्म हाथों के स्पर्श सेसहलाते हुए मीता ने काजल की गहरी आंखों में जासूसी करने लगी। कुछ तो मिलेगा यहां। मीता खुद का दुःख भूल चुकी थी क्योंकि काजल को मन का रोग लग रहा था। यह मन का रोग और रोगी कुछ बोलते नहीं अंदर ही अंदर चीखते हैं। काजल को सांत्वना की थपकी देती मीता अनायास ही कहने लगी,आज जैसे मेरा वजन अचानक से घट गया हो। इतना हल्का तो मैंने कभी महसूस नही हुआ था। आज हो रहा है। मैं नदी की धारा सी उमड़ती सी बही जा रही थी। मुझे एहसास ही न हुआ था कि मैं किस ओर जा रही थी। प्रेम पथ जिसे कह सकते हैं, ऐसा ही विस्तृत पथ मेरे सामने पाकर मैं भूल गई थी कि वो पथ मेरा नही था मुझे तो वह अपना लग रहा था। मैंने मान लिया था कि ये पथ मेरा है, और मेरा ही रहेगा। पर किसी ने मुझे झकझोर कर रख दिया अचानक से, जैसे किसी ने मुझे अपनी औकात दिखा दी। मुझे यह बताया कि तुम इस प्रेमभूमि को अपना मत मा...