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अपनी ओर

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 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे कहने वाले, सुनने वाले,घावों को बहते देखेंगे घनघोर निराशा के बादल,तुमको न सफल बनने देंगे पीड़ाओं की ये आबादी,पथ में कांटे बिखरा देंगी मिलेंगे बहुत समझाने वाले,चलते-पथ से भटकाने वाले  अपना मन बहलाने वाले, बीच अधर लटकाने वाले आसान न होगी एक डगर,रुकना नहीं है तुमको मगर  उल्टी धारा में उतरे तो,मौजों की उंगली तोड़ो तो, यह तुम पर ताने कसने वाले,तुमसे ही मिलने आएंगे सब राग द्वेष को भूल भाल, बस एक राग में गाएंगे संघर्ष शिशिर का सूरज है,जुगनू मन वाले क्या जानें  तुमने जो तप से साध लिया,ये मूल्य कोई क्या पहचाने तुम शोक -सोच को परे धरो,मन में लिए मशाल बढ़ो लघुता- जड़ता से निकलो तो,अपनी आभा को परखो तो  सब तूफानों की राह बदल,तुम भीग चुके अब बरसों तो                                ...

सारस सा मन

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  उत्सव और विलाप जीवन में एक साथ देखना हो तो वाराणसी के घाटों को देखें। आँखों में और भी मोह पसरता जायेगा इस नश्वर जीवन के लिए। कभी -कभी  मन युँ उदास उजड़ा सा जड़ होना चाहेगा कि नग्न सत्य के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आएगा।       जैसे प्रेम में डूबा हृदय उबरना नहीं चाहता और प्रेम का अंत किसी की आँखों में देख प्रेमी हृदय जीना नहीं चाहता। फिर भी प्रेम से लोग उबर जाते हैं या ऊब जाते हैं और नहीं जीने वाला प्रेमी मन भी खुद को मरने नहीं देता। उन दो इंसान को कभी देखा है जो असीम प्रेम में बंधे होते हैं लगता है कि एक दूसरे से विलग हो जी नहीं पाएंगे।उनमें से सिर्फ एक सारस सा होता है और एक  सारस सा दिखने वाला होता है। वो साथ जीने- मरने की कसमें भी खाते हैं।फिर भी, विलग होने की स्थिति में एक थोड़ा समझदार प्रेमी स्वयं को समाज का हिस्सा मानते हुए समाज की सुनकर किसी अन्य के साथ जुड़ जाता है और दूसरा उसे किसी और से जुड़ता देख तड़प कर मर जाता है। यह दुनिया की रीत है ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे और साथ जान देने के किस्से भी मिल जायेंगे।    ...

पिंजरा तोड़ जाना नहीं

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 पिंजरे में रहना किसको पसंद है..?किसी को नहीं।कोई नहीं चाहता कि वह पिंजरे में कैद रहे,पर कभी-कभी हम अपने आप को खुद में ही कैद करके रखते हैं । इस तरह से कैद करके रखते हैं कि हम बाहर आने के लिए तड़पते हैं और पिंजरे की सलाखें पतले धागे  जितनी कमजोर होते हुए भी तोड़ नहीं पाते।बहुत ही कमजोर होती है उसकी सलाखें कोई भी हल्के से दबाव से तोड़ सकता है पर वह टूटा नहीं । पता नहीं क्यों लगता है कि सब तोड़ ताड़ करके सब बाहर निकल जाओ । पर एक पल के लिए यही सोचती हूं कि बाहर क्या मिलना है...?आकाश...यह दूर तलक पहले धरती ....अपना मन,अपने नदी,अपने किनारे,अपने घर में अपने आंगन की चिड़िया....  सब कुछ तो अपना है,फिर किसी और की जरूरत कैसे पूरी होगी...?वह तो कहीं ऐसे ही मिलने की कहानी....फिल्मों की तरह कि,कहीं  वह मिल जाए कहीं भी भटक जाए.....जैसा की फिल्मों में होता है कि हीरो जो है अचानक हीरोइन के सामने आ जाता हैl यही हीरोइन चलते हुए उलझ कर हीरो के गोद में आ जाती हैl ऐसे दृश्य और ऐसे वाक्य रियल लाइफ में नहीं होते रियल लाइफ बहुत ही रियल होती हैl इतनी रियल होती है कि जहां हमारी कल्पनाएं काम न...

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

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  निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर हम सभी आभासी माध्यम से जुड़कर मातृभाषा के प्रति जागरूकता को बढ़ाने के लिए प्रयास कर रहे हैं।"अपनी माटी अपना देश अपनी भाषा अपना वेश"अनीश कुमार गुप्ता जी की यह रचना है। जो हमें अपनी भाषा में अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करती है।इसी सम्बन्ध में हम देखते हैं कि हमारे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जी ने भी कहा है कि "जिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है वह उन्नत नहीं हो सकता।"           सीवी रमन जी ने भी कहा है कि "हमें विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में ही देनी चाहिए।अन्यथा विज्ञान एक ऊंचे स्तर की गतिविधि बनकर रह जाएगा। यह एक ऐसी गतिविधि नहीं होगी जिसमें सभी लोग भाग ले सकें।" हमें इस विषय में सोचने की भी आवश्यकता है। प्रत्येक भाषा एक धरोहर है और भाषा विविधता मानवता की सबसे बड़ी ताकत है।इसमें कोई संदेह नहीं है। एली विजेल ने कहा है कि "भाषा जीवित चीज हैं,वह बदलती हैं,वह बढ़ती हैं,वह मरती हैं।"       इसलिए हमारी मातृभाषाओं का संरक...

कहानी सा (like story )

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सिर पर कोई बोझ सी तुम्हें लेकर कब से चल रही हूँ। तुम एक बार अपना बोझ खुद तो उठा कर देखो.. थक जाओगे थोड़ी ही दूर चलकर। मिताली की ननद ने उसे अपने पति की बेरुखी को जताने का संकेत किया था ताकि वो भी जान सके कि जिस पुरुष के गले उसे बांधा गया वो बंधन उसका ही गला  घोंट रहा था। लेकिन क्या कर सकते थे रिश्तों से निकलना इतना आसान कहाँ होता है वो भी एक निम्न वर्गीय महिला के लिए। मिताली तो उसकी शादी के समय कोई राय नहीं रख सकती थी... वो भी तो नई -नई आयी थी। उसने अपनी ननद को समझा बुझा कर उसके पति के पास भेजना चाहा। पर, वह सफल न हो सकी। अपने बीते हुए कल की ओर देखते हुए नेहा कहने लगी-एक बार मुझे लगा था कि शायद  मैं प्यार में हूँ... पर मैं पूरे होश में रही मेरा दिल दिमाग़ कंट्रोल में आ गया... मैं लौट रही हूँ उस ओर से जिधऱ कभी नहीं जाना... अगर आगे जीवन में मैं अगर किसी के लिए आराध्य भाव रख कर प्रेम में पड़ी तो मेरा जीवन सफल हो जायेगा... प्रेम बहुत बड़ी नेमत है हर किसी की किस्मत में प्रेम नहीं मिलता... ह्रदय कोई सितार सा है वीणा सा है कोई भी तार ढीला हो या टूट जाए तो कितनी भी कोशिश करें कोई...मध...

बंधन

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 रक्षा सूत्र और मंगलसूत्र जिसके मजबूत ना हो उसकी और कोई भी नजर उठा सकता है हर जिसके मजबूत हूं उसकी और कोई नजर उठाने की हिम्मत नहीं करता जिनके यह दोनों मजबूत नहीं होते उन्हें अपनी रक्षा खुद करनी होती हैरि। रिश्ते कभी भी किसी की मेहरबानी से नहीं चलते इसके लिए रिश्ते में बंधे दो  लोग स्वीकार और समर्पण से ही करते हैं। मालती की बहन रोहिणी ने बड़े ही रूआँसे ढंग से अपनी बहन को कहा- मैं अब वहाँ कभी नहीं जाउंगी। बीच में ही रोकते हुए मालती बोल पड़ी.. चुप रहो... कभी दुबारा ऐसा मत कहना। चेतावनी भरे स्वर से रोहिणी सहमी तो पर चुप नहीं हुई। रोते हुए उठ कर बाहर लॉन में जा पहुंची।           कभी कभी ऐसा लगता है अब एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाऊँगी... मन इतना हार जाता है, दिल इतना बैठने लगता है कि साँस लेना भी मुश्किल होने लगता है। ऐसा लगता है कि कोई निःस्वार्थ अपनापन जताने वाला, प्यार से सहलाकर गले लगाने वाला, माथे को चूम कर कहे मैं हूँ तुम्हारे साथ तुम्हें थकने नहीं दूंगा... इतना मजबूत बनते बनते सब कुछ बिना किसी को बताये सहते हुए थक गई हूँ झूठी म...

कभी -कभी

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ट्रैफिक के बीच कुछ ऐसा देखा मैंने की जुबाँ को जैस पक्षाघात सा हो गया हो ...एक माँ के दो बेटे  जिनके कन्धे को अपना सहारा बनाने के लिए माँ  ने कदम बढ़ाये पर वो गिर पड़ी ।उसके कण्ठ  ने जैसे स्वरों का मार्ग अवरुद्ध कर दिया हो ..उसकी आँखें क्षण भर के लिए जैसे अपने बेटों से उत्तर पाने के लिए  उत्सुक हुई हों... पर निराशा से नत आँखों में उत्तर साफ दिखने लगा ,कि बेटों ने माँ को सहारा क्यों नही दिया.....तबतक एक बेटे ने माँ को झटके से उठाया मुझे क्षण भर में ही स्वयं के अनुमान पर आशंका हुई ,इसी क्षण भर में ही उस बेटे ने अपनी माँ को दस गुना वेग से जमीन पर पटका ।मैं स्तब्ध ... ये क्या हुआ ? वहीं दूसरे बेटे ने उसी दस गुने वेग से माँ पर गालियों की बौछार की 'ई!!!साली अइसे  ना मरी..... अरे...ई ..साली सब खाइ के मरी'  इतने अपशब्द..... मैंन किसी  को न कहते देखा है ..न सुना है।मुझसे न जाने क्यों  बस मे बैठा नही गया जैसे ही बस आगे बढ़ी मेरे कदम  भी आगे बढ़े और मैं नीचे उतर आइ उन बेटों का पशुवत् व्यवहार का कारण जानने के लिए... मुझे जो उत्तर मिला वह.....     ...