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Showing posts from August, 2025

कोई ऐसा कहे तो (koi aisa kahe to) story

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 कोई ऐसा कहे तो  पतली सी छरहरी सी काया और भोलापन इतना कि सामने वाले की भी तोतली जुबान हो जाए ... किसी परिचय की मोहताज नहीं वह पर जिसे चाहती है , वह तो उसे शायद जानता भी नहीं कि वो भीतर से क्या है। फिर भी वह उसे ही चाहती है। क्यों  चाहती है वह यह नहीं जानती पर उसमें कोई वासना नहीं है बस प्यार है जिसमें शरीर भी महत्वपूर्ण हो गया है। प्रेम के प्याले तो दो ही होते हैं। अरुणा एक रंगकर्मी है । नुक्कड़ नाटकों से होते हुए प्रेक्षागृह तक का सफर उसके लिए कभी भी आसान नहीं रहा ।पर, उसने उसे अपने अनुसार बनाने की कोशिश उसने जरूर की । वैसे तो वह एक अच्छी रंगकर्मी है। किंतु, जब भी वह उस शख्स को देखती है तो सब भूलने लगती है। ऐसा लगता है उसे कुछ आता ही नहीं। आज वह अगले मंचित होने वाले नाटक से पहले इतना अभ्यास कर लेना चाहती है कि उसे नाटक में सच्चाई और सच्चाई में भी नाटक महसूस करा सके। जैसी उसकी भावना होगी वह वैसी प्रतिक्रिया देगा। वह समझ गया तो सच्चाई नहीं समझा तो एक संवाद ही रह जाएगा। अपनी बचपन की दोस्त के पास खड़ी अरुणा सामने लगे आदमकद शीशे में अपनी छवि और आंखों में उसे ही देखती है।पहला ...

"एक पेड़ मां के नाम"(One Tree for Mother)

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   "एक पेड़ मां के नाम"(One Tree for Mother) माँ जीवन दायिनी है। जीवन देती है और माँ प्रकृति जीवन का पोषण करती है। वह जीवन जो हम दुनिया में आने के बाद शुरू करते हैं।माँ के गर्भ से निकलने के बाद एक माँ की गोद में हम आ जाते हैं। माँ हम सब की प्रेरणा होती है।उस मां को समर्पित करने के लिए उसके आंचल को सुरक्षित रखने के लिए हमारा भी कर्तव्य है, कि हम उसे उस रूप में बने रहने दें,जिस रूप में वह है। हम प्रायः देखते हैं कि हमारे आस-पास जो लोग हैं वह कहीं ना कहीं प्रकृति से छेड़छाड़ में अपना योग दे रहे हैं। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है प्लास्टिक का प्रयोग। हम सभी प्लास्टिक का प्रयोग बिना उसके दुष्परिणामों को सोचे बिना कर रहे हैं। प्रकृति, पर्यावरण और यह परिवेश जो हम आप नित नए प्रयोगों से दूषित कर रहे हैं। वह चिंतनीय है। इस ओर कदम बढ़ाने की आवश्यकता है कि,हम इस प्रकृति का पुनः पोषण करें। प्रकृति को दोहन से बचाने के लिए प्रकृति का दोहन ना हो इसके लिए हमें कुछ न कुछ प्रयास करने ही होंगे। प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हमारी जिम्मेदारी भी है और हमारा दायित्व भी है। क्योंकि हम इसी प्रकृति की गोद ...