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Showing posts from June, 2024

Artical (शिक्षा, संस्कृति और भारतीय परिवेश)

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 एक बात तो हम सभी मानते हैं कि भारतीय परिवेश में ज्ञान आदि स्रोत के रूप में वेदों को ही आधार बनाया जाता हैl भारतीय ज्ञान परंपरा में वेद ही ज्ञान का आरंभ माने जाते हैं l'शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ,नई दिल्ली सह अभ्यास वर्ग व कार्यशाला' ....यह लेख सिर्फ तटस्थ भाव से ही पढ़ें ....शिक्षा वह है जो हमें उचित -अनुचित का बोध कराती है l विपरीत परिस्थितियों के भंवर से बाहर निकालती है lकिंतु,शिक्षा का अर्थ संकुचन डिग्रियों तक ही होकर रह जाता हैl इस स्थिति में हमें आवश्यकता है ,शिक्षण उद्देश्य को समझते हुए समाज तक पहुंचनाl यह कार्य हम सभी का हैl जिसका दायित्व बोध हमें नहीं हो पाता l हम में से ही एक डॉक्टर दीनानाथ बत्रा जिन्हें इसका बोध हुआ और उन्होंने वर्ष 2004 में 'शिक्षा बचाओ आंदोलन' की शुरुआत कीl यह आंदोलन एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में गलत ढंग से किए गए बदलावों पर केंद्रित थाl किंतु,आज की स्थिति यह है कि इस आंदोलन का रूप बदलकर 'शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास' हो गया हैl जिसके संस्थापक के रूप में दीनानाथ बत्रा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैl अब इसके अभियान से जुड़े 11 विषय- च...

ग्वालियर किला

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 आवश्यक कार्य हेतु पिछले सप्ताह ग्वालियर(MP, India) जाना हुआ.......फिर क्या...ऐतिहासिक स्थल ने मुझे अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया lसमय निकाल कर ग्वालियर फोर्ट भी गईl लाल बलुये पत्थर से बनाया गया ग्वालियर किला...जिसकी नींव सूरज सेन कच्छवाहा ने रखी थीl बाद में मानसिंह तोमर ने भी किले को एक नया रूप दिया थाl यह जो किला बना है ऊँचे पठार पर है ....और उस तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैंl पहले रास्ते 'ग्वालियर गेट' से ही जाना हुआ.. ग्वालियर का यह किला, जिसके प्रवेश द्वार तक पहुँच कर ये लगता है कि किले की ऊँचाई तक कैसे पहुँचा जायेगा, मन साहस खोने वाला ही होता है, तबतक टेक्सी वाले पूछने लगते हैं कि ऊपर तक चलेंगे आपको छोड़ दें....? तब ये लगने लगता है कि नहीं.....थके हुए कदमों से ऊपर तक पहुचेंगे वो ठीक हैlपर, किले को शुरुआत से ही देखते हुए ही जाना है... कुछ भी मिस नहीं करना करना हैl ऐसा मुझे लगाl किसी और को क्या लगता, ये तो नहीं कह सकतीl            किले को शुरुआत से देखने पर लगता है कि,इस पूरे पहाड़ को मजबूत नींव बनाकर ही किले का निर्माण कराया गया थाl.......यहां जब ह...

Story-पिंजरा (pinjra)

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  Pinjra (story)  पिंजरे में रहना किसको पसंद है..?किसी को नहीं।कोई नहीं चाहता कि वह पिंजरे में कैद रहे,पर कभी-कभी हम अपने आप को खुद में ही कैद करके रखते हैं । इस तरह से कैद करके रखते हैं कि हम बाहर आने के लिए तड़पते हैं और पिंजरे की सलाखें पतले धागे  जितनी कमजोर होते हुए भी तोड़ नहीं पाते।बहुत ही कमजोर होती है उसकी सलाखें कोई भी हल्के से दबाव से तोड़ सकता है पर वह टूटा नहीं । पता नहीं क्यों लगता है कि सब तोड़ ताड़ करके सब बाहर निकल जाओ । पर एक पल के लिए यही सोचती हूं कि बाहर क्या मिलना है...?आकाश...यह दूर तलक पहले धरती अपना मन,अपने नदी,अपने किनारे,अपने घर में अपने आंगन की चिड़िया....  सब कुछ तो अपना रहे हो फिर किसी और की जरूरत को कैसे पूरी होगी वह तो कहीं ऐसे नहीं मिलने की कहानी फिल्मों की तरह कहीं  वह मिल जाए कहीं भी भटक जाए.....जैसा की फिल्मों में होता है कि हीरो जो है अचानक हीरोइन के सामने आ जाता है यही हीरोइन बातें करते उलझ कर हीरो के गोद में आ जाती हैl ऐसे दृश्य और ऐसे वाक्य रियल लाइफ में नहीं होते रियल लाइफ बहुत ही रियल होती हैl इतनी रियल होती है कि जहां ह...