अनुराग तडाग में खिलती हिंदी
अनुराग तडाग में खिलती हिंदी हिंदी भाषा को किसी परिचय या परिभाषा की आवश्यकता नहीं पड़ती यही इसकी पहली विशेषता है।विश्व में जब भी 'हिंदी'शब्द बोला जाता है, तब मनो मस्तिष्क में भारत की छवि उभर आती है।रविशंकर शुक्ला जी ने कहा है कि "अब हिंदी ही मां भारती हो गई है वह सब की आराध्य है सबकी संपत्ति है।" जब भी हम हिंदी की बात करते हैं तब भारत की ओर ध्यान आकृष्ट हो ही जाता है। यह प्रतीक ही प्रभावी ढंग से कार्य करता है। जैसे अन्य देशों का प्रतीक वहां की मुख्य भाषा होती है। जब से हिंदी भाषा के प्रचार- प्रसार की बात शुरू हुई तब से आज तक हिंदी पर अनगिनत विचार लिखे गए आलेख, पुस्तकों,डिजिटल प्लेटफॉर्मों आदि के माध्यमों से हमारे समक्ष आते रहे हैं।प्रत्येक वर्ष हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़ा मनाते हुए कार्यक्रम स्थल, सभागार, सदन संगोष्ठियां हिंदीमय हो जाती हैं सदन के भीतर हिंदी हमारे मनो मस्तिष्क पर इस प्रकार हावी हो जाती है कि लगता है कि अब हम सब हिंदी के अनुरागी हो गए हैं। अब हिंदी ही हिंदी हर और गूंजेगी। किंतु धरातल का पथरीला कंकड़ीला यथार्थ कुछ और ही कहता है। ...