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Showing posts from January, 2026

कहना तो था ((story )

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कहना तो था (story) मोहिनी सजती है, सँवरती है, पर अधूरी रह जाती है ।क्योंकि उसके होठों पर वह मुस्कान नजर नहीं आती जो उसके चेहरे को चमकते चांद का टुकड़ा बना देती है। उसने अपने पड़ोसी सुरेश को देखा और देखते ही उसकी तरफ बढ़ने लगी। बढ़ तो रही थे पर, ऐसा लग रहा था यह कदम आगे नहीं पीछे ही बढ़ रहे हों।मोहिनी ने आवाज दी,सुरेश! सुरेश तुम बहुत अच्छे हो।मैं तुमसे अपने दुर्व्यवहार के लिए माफी चाहती हूँ।मैंने तुम्हारे साथ कभी अच्छा नहीं किया। मेरे इतने "दुत्कारने के बाद भी तुम मेरे एक बार कहने पर मेरे पास आ जाते हो ,जी तो नहीं करता कि किसी से अपने दिल की बात कहूं पर न जाने क्यों आज मन बहुत बेचैन है। इतना बेचैन है ,कि कुछ सूझ नहीं रहा ।इस समय तुम्हारा ख्याल आया।एक तुम हो जो मेरे साथ खड़े हो जाते हो ।तुमसे कुछ कहना चाहती हूं ,वह कहना चाहती हूं जो मैं किसी और से नहीं कह सकती। मुझे पता है कि तुम मेरे बारे में अच्छा नहीं सोचोगे। फिर भी ,मैं तुमसे हर एक बात कहना चाहती हूं जो मुझ पर बीत रही है ।जिस पीड़ा को मैं भोग रही हूं ।मेरी हर बात सुनकर तुम शायद मुझसे नफरत करोगे। फिर भी ,मैं तुमसे कुछ कहना चाहती ...

जल कंठेश्वर शिव मंदिर (Jal Kantheshwar Shiv temple)

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जल कंठेश्वर शिव मंदिर (Jal Kantheshwar Shiv temple ) उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश ) से दक्षिण भारत की यह यात्रा किसी सुखद कारण से नहीं रही। पिता जी कैंसर के चौथे चरण में थे हम सब हिम्मत हार रहे थे। किन्तु, पिताजी का साहस बना हुआ था। वह हमेशा की तरह मजबूत मन वाले ही दिख रहे थे। इस मोह माया और संसार को यहीं छोड़कर जाना हर कोई सहर्ष स्वीकार नहीं कर पाता। 'माया महा ठगिनी मैं जाना'हम उन्हें लेकर वहाँ के प्रसिद्ध कैंसर हॉस्पिटल गए, पर वहाँ भी वही उत्तर मिला जो हम जानते थे। उस समय वहीं पास ही शिव मंदिर का पता चला फिर हम वहाँ गए। यह भक्ति भगवान से प्रार्थना थी कि वह पिताजी को स्वस्थ कर दें। पर, हुआ वही जो होना निश्चित था। पिताजी हम लोगों को छोड़कर चले गए। 2022 के बाद अब उस स्मरण को लिख रही हूँ। उस समय वह सिर्फ शिव मंदिर था। आज उसे उसके निमार्ण  अद्भुत वास्तुकाला शिल्प को देखती हूँ। आश्चर्य होता है मानव की कल्पनाशीलता पर कि कलाकार अपनी रचनाओं से अमर हो जाता है। आइये इस मंदिर के बारे में -जल कंठेश्वर मंदिर द्रविड़ शैली (दक्षिण भारतीय) में बना एक प्राचीन शिव मंदिर है, जिसमें विशेष रूप से विजयनग...

जीवन (Life )

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जीवन (Life) जीवन एक अनमोल उपहार है, जो रहस्यों, अनुभवों और संभावनाओं से भरा है। यह एक सफर है — कभी आसान, कभी चुनौतीपूर्ण, लेकिन हर पल सीखने और बढ़ने का अवसर लेकर आता है। संसार की नश्वरता ही शाश्वत सत्य है।जिसे नग्न नेत्र कभी देख नहीं पाते। प्रायः जीवन स्वयं से शुरू होकर सर्वस्व पर समाप्त होता है। यह स्वयं से स्वयं की ओर बढ़ने का क्रम जब तक समझ में आता है,तब तक लगभग हमारी आधी उम्र निकल चुकी होती है। क्योंकि पक्की समझ विकसित होने के लिए समय चाहिए। मेरी कविताओं का यह संग्रह जिनके पन्ने सरसराते हुए गुजरती आपकी नजर एक पल के लिए रुक कर कहती है-यह संसार तो मेरा भी जाना -पहचाना सा लग रहा है। वह संसार जिसमें शाम बेहद खूबसूरत सांवली परी सी सूरज को आंचल में छुपाए आंखों में उतरती चली जाती है। जैसे उतरना ही उसे आता हो। सूरज भी दिन भर तपते- तपते थककर चूर उसकी गोद में सर छुपाए सुकून से सोना चाहता हो।दोनों का अदभुत मिलन है।साँवली सी काया और भी गहराती जाती है।धीरे-धीरे नीरवता सन्नाटे की भाषा अपनाने लगती है।शाम तो शाम है,वह ढलने के लिए ही है। चाहे दिन का उजाला हो या जीवन की दोपहर दोनों ही शाम को महसूस न...

पत्थर

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 पत्थर तोड़ना और पत्थर तराशना दोनों में बड़ा अंतर है मैं तुम्हारे लिए छेनी थी पत्थर तो तुम्हें बहुत मिलेंगे हथौड़े भी बहुत मिलेंगे पर तुम्हें तराशने के लिए मेरी जरूरत पड़ेगी और पड़ी भी तराशने में तुम्हें मैंने मदद भी की पर तुमने सिर्फ और सिर्फ पत्थर ही समझा जो आपसे बहुत सी बातें करना चाहता है उसे ख़ामोशी पहना दे सिर्फ इसलिए कि उसके पास आपके  अधिक लोग नहीं... जिसने आपको अपनी दुनिया बना लिया हो उसकी दुनिया उजाड़ना, उसकी हत्या करने के बराबर ही है.... दिल के शोर जब अचानक से गला घोंट कर बंद करा दिए जाते तो इंसान जीते जी मरने लगता है...अपनी जिंदगी की शाम होते देखना आसान नहीं है कभी -कभी हम बहुत कुछ सोचते हैं समझते हैं और बड़ी ही सावधानी से कार्य करते हैं। किन्तु कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिसके बारे में हम सोच ही नहीं पाते और वो घटनाएं हमारे जीवन की अंतिम घटना बन जाती है या हम मौत को छूकर मानो आ जाते हैं। जिसको मौत गले लगा लेती है वो तो उसके साथ हो लेते हैं पर जो मौत को छूकर आते हैं, वो मानो दूसरा जीवन पाते हैं। जिसका महत्व कुछ अधिक बढ़ जाता है। दुनिया में कोइ कागज और नियम ऐसा नहीं हो...

एकता की मूर्ति (statute of unity)

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शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की सूरत कार्यशाला के समापन के बाद एकता की मूर्ति को देखने का अवसर मिला।यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मैं उस देश की नागरिक हूँ जहाँ लोग एक दो लोगों के बीच विवाद सुलझा कर एक करने में सफल नहीं हो पाते यहाँ ऐसे ऐसे महान विभूतियाँ हैं जो एक दो क्या 562 रियासतों को एक कर संघ बना सकने का सामर्थ्य रखते थे, हमारी मिट्टी उर्वरा है... अभी और भी इस मिट्टी से निकलेंगे जो मिट्टी को माथे से लगाएंगे.. नमन है ऐसे वीरों को🙏 स्टैच्यू ऑफ यूनिटी (Statue of Unity) विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा है, जो भारत के प्रथम उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को समर्पित है 1. ऊंचाई: 182 मीटर (597 फीट) – यह न्यूयॉर्क की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से लगभग दोगुनी ऊँची है। 2. स्थान: गुजरात के नर्मदा जिले में साधु बेट नामक एक नदी द्वीप पर, सरदार सरोवर बांध के पास। 1. ऊंचाई: 182 मीटर (597 फीट) – यह न्यूयॉर्क की स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से लगभग दोगुनी ऊँची है। 2. स्थान: गुजरात के नर्मदा जिले में साधु बेट नामक एक नदी द्वीप पर, सरदार सरोवर बांध के पास। 3. उद्घाटन: 31 अक्टूबर 2018 को प्रधानमंत्...

संसार जिसे मैंने चुना

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 मकर संक्रांति और लोहड़ी की खुशियों के बीच मेरे लिए एक और हर्ष का विषय रहा, मेरी दूसरी काव्य पुस्तक (कविताओं का संकलन )जिसका शीर्षक मैंने दिया है "संसार जिसे मैंने चुना " के लोकार्पण का। दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में (14.1.2026) आदरणीय जीतेन्द्र श्रीवास्तव जी, श्री अजित कुमार राय जी, श्री महेश दर्पण जी, श्री हीरालाल नागर जी, श्री प्रदीप पंत जी,प्रकाशक श्री जीतेन्द्र पात्रो जी, श्री शुभम जी व अन्य गण मान्य साहित्यकारों के द्वारा प्रलेक प्रकाशन के स्टॉल (P 03) लोकार्पण हुआ।                इस संकलन में में मेरी वह रचनाएँ हैं जो मेरे मन को समाज से, रिश्तों से जुड़ते हुए उनकी अनुगूँज लिए हैं। कभी- कभी कोई भाव अपने न होते हुए भी स्वयं में अनुभव कर उसे समझने के लिए भी प्रेरित करते हैं। ऐसा कई बार हुआ जब मुझे लगा कि, मैं यदि ऐसा अनुभव करूँ तो कैसा लगेगा। तो समझ आया कि कई स्थितियाँ बहुत विकट होती हैं, जिसमें व्यक्ति घुटने लगता है। इन सभी स्थितियों से पार जाने का मार्ग भी समाज के हर वर्ग से होकर जाता है। आवश्यकता है क...

परिवार और समाज (Family and society)

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 हमारा जीवन कितना महत्वपूर्ण है, हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते।इसका अंदाजा तब लगता है जब हम कभी बीमार पड़ते हैं या कभी ऐसी स्थिति आती है कि जब हम आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं और भोजन की व्यवस्था नहीं कर पाते हैं या धन होते हुए भी हम भोजन की व्यवस्था नहीं कर पाते हैं। कई स्थितियाँ होती हैं, परिस्थितियाँ होती हैं कि जब हम बहुत बुरे फंसे होते हैं। उस समय हमें यह नहीं समझ में आता है कि हम अपने जीवन को कैसे बचाएं? जब भी हमारा जीवन संकट में होता है तब हमें अपने जीवन की अहमियत का पता चलता है… उस समय ऐसा लगता है कि एक-एक सेकंड हम अपने आप को बचा कर रखें।जब भी हम कभी ऐसी स्थिति में पड़ते हैं कि, हम उसे निकलने की सोच भी नहीं पाते.... ऐसा लगता है कि दूर तक कहीं कोई नहीं नजर नहीं आ रहा है, जो हमारी मदद कर सके। ऐसी स्थिति में इंसान यही सोचता है कि काश एक बार मुझे मौका मिल जाए मैं अपने जीवन को संरक्षित कर सकूं।सुरक्षित रख सकूं, तो दोबारा से ऐसी स्थिति नहीं आने दूंगा या नहीं आने दूंगी। कोई ऐसा सोचता है कि उसके जीवन में ऐसे संकट कभी ना आए लेकिन ऐसे संकट आते जरूर हैं।लोग जब संकट में पड़ते हैं तभी वह द...

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की वार्षिक कार्यशाला 2025

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 शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली, सरदार वल्लभभाई राष्ट्रीय प्रऔद्योगिकि संस्थान, सूरत -गुजरात तथा वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय, सूरत -गुजरात के संयुक्त तत्वावधान में  आयोजित राष्ट्रीय शैक्षिक कार्यशाला (25से 28 दिसंबर 2025) में सहभागिता का अवसर अवध प्रान्त की भारतीय भाषा मंच की प्रान्त संयोजिका के रूप में रहा।        इस कार्यक्रम का उद्देश्य विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए पंच परिवर्तन की संकल्पना (1. स्व का बोध 2. नागरिक कर्त्तव्य बोध 3.पर्यावरण 4. सामाजिक समरसता 5. कुटुंब प्रबोधन ) को साकार रूप देते हुए क्रियान्वयन के लिए प्रेरित करना रहा।न्यास के सभी महत्वपूर्ण विषयों को भारतीयता से जोड़ते हुए, भारतीय ज्ञान परम्परा के आधार को लेते हुए पंचकोशों के प्रति जागरूक करना भी सभी का लक्ष्य होना चाहिए इसके लिए भी प्रेरित किया गया। कार्यशाला के उद्घाटन सत्र  में न्यास की विकास यात्रा का पुनः उल्लेख करते हुए विषय वस्तु की रुपरेखा को प्रस्तुत किया गया।राष्ट्रीय सचिव, न्यास श्री अतुल कोठारी जी के द्वारा "विकसित भारत विनिमय परिषद" ...