हमारा जीवन कितना महत्वपूर्ण है, हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते।इसका अंदाजा तब लगता है जब हम कभी बीमार पड़ते हैं या कभी ऐसी स्थिति आती है कि जब हम आर्थिक रूप से कमजोर हो जाते हैं और भोजन की व्यवस्था नहीं कर पाते हैं या धन होते हुए भी हम भोजन की व्यवस्था नहीं कर पाते हैं। कई स्थितियाँ होती हैं, परिस्थितियाँ होती हैं कि जब हम बहुत बुरे फंसे होते हैं। उस समय हमें यह नहीं समझ में आता है कि हम अपने जीवन को कैसे बचाएं? जब भी हमारा जीवन संकट में होता है तब हमें अपने जीवन की अहमियत का पता चलता है… उस समय ऐसा लगता है कि एक-एक सेकंड हम अपने आप को बचा कर रखें।जब भी हम कभी ऐसी स्थिति में पड़ते हैं कि, हम उसे निकलने की सोच भी नहीं पाते.... ऐसा लगता है कि दूर तक कहीं कोई नहीं नजर नहीं आ रहा है, जो हमारी मदद कर सके। ऐसी स्थिति में इंसान यही सोचता है कि काश एक बार मुझे मौका मिल जाए मैं अपने जीवन को संरक्षित कर सकूं।सुरक्षित रख सकूं, तो दोबारा से ऐसी स्थिति नहीं आने दूंगा या नहीं आने दूंगी। कोई ऐसा सोचता है कि उसके जीवन में ऐसे संकट कभी ना आए लेकिन ऐसे संकट आते जरूर हैं।लोग जब संकट में पड़ते हैं तभी वह दूसरे विकल्पों की ओर ध्यान देते हैं।नहीं तो वह अपने में ही डूबे रहते हैं। अपना सब कुछ देखते हुए आँख मुंदे रहते हैं।अहंकार को सर पर रखते हैं। कभी यह नहीं सोचते कि, हम भी कभी किसी के दबाव में आएंगे।वह खुलकर जीते हैं।इंजॉय करते हैं।जीवन का आनंद लेते हैं और यह भूल जाते हैं कि यह जीवन कितना अनमोल है। यह तभी समझ में आता है जब जीवन संकट में पड़ जाता है। इस विषय में हम यह कह सकते हैं कि हम अपने संबंधों की ओर भी उदासीन भाव रखते हैं। हमारे संबंध जो भी हैं उन पर हम अधिक गहनता से विचार नहीं कर पाते हैं। हमें लगता है कि हमारे आसपास जो भी संबंध है। बस बहुत है। उन्हें संभालने की जरूरत नहीं है। जो जैसा चल रहा है,चलने दिया जाए। यह वही सोचता है जिसके पास सारे संबंध हैं।सभी लोग आसपास मौजूद हैं।लेकिन कभी उस व्यक्ति से मिलकर देखे उससे पूछ कर देखिए जिसके पास माँ नहीं है,पिता नहीं है,भाई नहीं है, बहन नहीं है,पत्नी नहीं है,पुत्र नहीं है, पुत्री नहीं है या संबंधों में अभाव है।जब वह छिन जाता है तभी हमें ज्ञान होता है कि, हमारे पास क्या नहीं है?और दूसरे के पास जो है वह हमसे बेहतर कैसे हैं?हमें लगता है फिर कि,हम उस चीज को भी प्राप्त करें, उस कमी को भी पूरा कर ले जो हमारे पास नहीं है। लेकिन जिसके पास सब कुछ होता है वह उसकी कदर ही नहीं करता।
पति-पत्नी के आपस के संबंध जो है आज हम देख रहे हैं कि कुछ अधिक ही संबंध विच्छेद हो रहे हैं।
भले ही अलग हो या ना अलग हो,एक छत के नीचे रह रहे हो, एक बिस्तर पर सो रहे हो पर,वह मन से बहुत दूर जा चुके होते हैं। मन से तो इतने दूर होते हैं कि वह पास में रहते हुए दूरी का ही अनुभव करते हैं। पास होना उनके लिए व्यवस्था है। कहीं ना कहीं बच्चों के लिए, परिवार के लिए,समाज के लिए, डर वश एक साथ रहने के लिए आर्थिक कारण भी हैं।महिलाएं तो इसमें इसलिए भी बंधी हुई है क्योंकि उनके पास कोई और व्यवस्था ही नहीं है। महिलाओं के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें समाज का डर बहुत रहता है क्योंकि जब भी परिवार में कलह होता है क्लेश होता है,तो दोष जो है वह सिर्फ औरतों को दिया जाता है।महिलाओं को दिया जाता है,कि यह महिला अच्छी नहीं है। इसने संभाला नहीं।लेकिन कभी भी कोई इस ओर ध्यान नहीं देता है।
अपवाद स्वरूप कुछ महिलाओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर महिलाएं अपने परिवार के विषय में, अपने परिवार के विषय में,पुत्र के विषय में, पति के विषय में सबसे पहले सोचती हैं उन्हें अपने बारे में सोने का अवकाश ही नहीं रहता। सुबह से लेकर रात तक वह सिर्फ अपने से संबंधित जितने भी लोग हैं उनकी देखरेख में ही बिताती हैं।अपने लिए सोचने का उनके पास बहुत समय नहीं रहता है। सबसे अवकाश पाकर के तब जाकर वह अपने विषय में थोड़ा बहुत सोचती हैं।इसके बाद भी यदि कोई कहे की औरत जो करती है,क्या ठीक है..?कभी औरत की जगह पर खुद को रख करके तो देखिए आपको बहुत आराम से सब कुछ चाहिए होता है,कि औरत काम भी कर रही है।घर में भी काम कर रही है।बाहर भी काम कर रही है। बाहर की चीज भी संभाल रही है।आपके परिवार संभाल रही है।आपके बच्चों को संभाल रही है। आपका रिश्ते -नाते,आना- जाना,खाना -पीना सब कुछ संभाल रही हो तो बहुत अच्छी है। जब तक वह मुंह बंद किए हुए हैं। जब तक कि वह कुछ नहीं बोलती है तब तो वह बहुत अच्छी होती है, लेकिन जब बोलना शुरु करती है,अपने अधिकारों के लिए कहना शुरू करती है। अपने अधिकारों पर विचार करने लगती है और जब अपने हक की बात पूरे हक़ से कहने लगती है कि, मुझे भी चाहिए।मुझे भी समय चाहिए अपने लिए। अपने लिए वह बात ना करें बाकी वह कुछ भी करें कोई मतलब नहीं है तो क्या हमारा यह फर्ज नहीं बनता है कि हम उस महिला पर भी ध्यान दें जो हमारे लिए इतना कुछ कर रही है।क्यों कर रही है? किसके लिए कर रही है?कभी इस पर भी विचार करें… लेकिन नहीं।यह समाज है, इसी तरह से चलता है। समाज दूसरे के दोष को सबसे पहले देखा है और समाज बनता किस्से हमसे और आपसे।हम लोगों को समाज बनाता है। कहीं और से नही...पशु समाज तो है नहीं कि कोई ज्ञान की बातें नहीं है।हम तो इंसान हैं और ज्ञान की बातें तो भरपूर कूट-कूट कर हम ही में भरी हुई है। यह नहीं कह सकते हैं कि हमारे पास विचारों की कमी है।भावनाओं की कमी है।समझ की कमी है। सब कुछ होते हुए भी एक से एक परिवार देखिए आप देखेंगे कि बड़े से बड़े परिवार हैं जहां महिलाएं स्वतंत्र हैं।स्वच्छंद हैं।किंतु, उन्हें सीमा में रहना भी पड़ता है।यदि वह सीमा से बाहर जाती है तो वह आदर की नजर से तो नहीं देखी जाती।
हमारा परिवार जैसा भी हो लेकिन वह परिवार कभी भी औरतों को स्वच्छंद देख नहीं पाता है। औरत की बड़ी ममता भरी मूक छवि उन्हें ज्यादा आकर्षक लगती है कि जब औरत रोते हुए पति के चरणों में गिरी रहे। रोती रहे। अपने दुखों में डूबी रहे। वहां उसका हंसना सबसे ज्यादा अखरता है।जब वह हंसने लगती है,खुलकर नाचने लगती है, गाने लगती है, जीवन को जीने लगती है, आनंद लेने लगती है, मनोरंजन करने लगती है, तब वह चुभने लगती है सबसे पहले परिवार में, फिर समाज में।परिवार ने कभी सोचा है कि, उसका पति उसके बच्चे पर कोई वास्तव में अधिकार होता है?पहले तो वह पिता के अंडर में रहती है फिर पति के अंडर में आती है,फिर बच्चों के अंडर में आती है। उसे नियंत्रित किया जाता है।
लेकिन अब ऐसा नहीं है। उसने इन झंझावातों से निकलना सीख लिया है। आंधी, तूफान इन सब से निपटना सीख लिया है।विचारों में,समझ में आगे जा रही हैं और सबसे बड़ी बात की जिस बच्चे के लिए औरत साथ में रहती थी।बिना मन के सोती थी।पति को ढोती थी। वह अब झटककर किनारे कर रही है। वह दूर कर दे रही है सभी संबंधों को।जो उसके जीवन जीने में बाधक है। वह अपने बच्चों को लेकर निकल जा रही है कि, वह अपने भी देख लेगी बच्चों को भी देख लेगी। इतना सब कुछ है।लेकिन हम औरत हैं तो सबसे बड़ी बात यह है कि औरतों को ही यह नहीं अच्छा लगता है कि कोई औरत स्वतंत्र होकर के जी रही है।तो सबसे पहले जो वार होता है वह महिला की तरफ से ही होता है और पुरुष बार-बार करता है। कोई महिला कैसे स्वच्छंद है? कैसे वह विचारों से उन्मुक्त है? कैसे वह मुक्त गगन में विचरण कर सकती है?नहीं।उसकी वही बँधी बधाई छवि,वही औरत भी देखना चाहती है। हां, स्वयं स्वतंत्र है तो उसे कोई दिक्कत नहीं है।लेकिन, दूसरे की स्वतंत्रता को देख नहीं पाती।बहुत कम ऐसी औरतें होती हैं जो खुद भी आगे बढ़ती हैं और दूसरों को भी आगे बढ़ाती हैं। खुद के दुख को भुलाकर दूसरों का दुख भी दूर करना जानती हैं।ऐसी औरतें समाज में नमन योग्य हैं उनके आगे नतमस्तक हो जाना चाहिए।ऐसी औरतें पूजनीय हैं। जहां महिला स्वतंत्र है वहां अर्थ भी अपने आप आता है। किसी भी देश की बात देखें जो भी विकसित देश हैं।वहां औरतों पर इतना बोझ नहीं रखा जाता।वह जो है खुलकर जीती हैं और उन्हें संबंध विच्छेद करने में तनिक भी देर नहीं लगती है।जैसे ही उन्हें लगा कि नहीं अब संबंध में हम अब नहीं रह सकते।तो वह तुरंत दूर हो जाती हैं। ऐसा हम कह सकते हैं कि जितने भी देश हैं वहां औरतों की स्थिति पहले से ही ऐसी थी। नहीं।उन्होंने खुद को मुक्त करना सीखा है।खुद को समझ में स्थापित करना सीखा है और एक बार जब महिला स्थापित हो जाती है फिर वह समाज विकास करता है। वास्तव में, क्योंकि महिलाओं के कंधों पर समाज की जिम्मेदारी कुछ अधिक ही होती है। वह संस्कार भी देखती है और सभ्यता को भी देखती है। अपनी संस्कृति को भी देखती हैं।उसी के अनुरूप बच्चे का पालन पोषण करती हैं।
लेकिन, सब कुछ होते हुए भी हम यह देखते हैं कि पबहुत से परिवार भी कह रहे हैं,बच्चे हैं कि कुछ अलग ही परिवेश में जा रहे हैं?जो हम देना चाहते हैं, वह हम दे नहीं पा रहे हैं। बच्चे जब परिवार में रहते हैं दादा -दादी चाचा -चाची,बुआ, भाई -बहन सबसे घिरे रहते हैं तो कुछ अलग ही परवरिश होती है। लेकिन जब वह अकेले रहते हैं तब वह अपने तरीके से जीते हैं और अपने तरीके से सीखते हैं। जिस पर हम रोक नहीं लगा पाते हैं जितना भी चाहे माता-पिता की इच्छा बच्चों पर कितना असर डालती है इसका हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते।तब लगता है कि परिवार में सही थे परिवार इस मामले में बहुत सहयोग करता है कि बच्चे की परवरिश उसी प्रकार से होती है जैसे कि हम करते हैं। जब परिवार स्वस्थ होगा तब समाज स्वस्थ होगा,सारे संबंध भी स्वस्थ होंगे। जब ऐसा होने लगेगा तब हमारा देश भी सच्चे विकास की ओर बढ़ेगा।
डॉ संगीता
लखनऊ


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