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Showing posts from May, 2024

जीवन :एक सत्य(Life:A Truth) artical

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 शाम,बेहद खूबसूरत साँवली परी सी  सूरज को आँचल में छुपाये,आँखों में उतरती चली जाती हैl जैसे उतरना ही उसे आता हो ... और सूरज भी दिन भर तपते -तपते थक कर चूर,उसकी गोद में सिर छुपाये सुकून से सोना चाहता होl दोनों का ही अद्भुत मिलन हैl साँवली सी काया और भी गहराती जाती है, धीरे- धीरे नीरवता सन्नाटे की भाषा अपनाने लगती हैl शाम तो शाम है वह तो ढलने के लिए ही है.... चाहे दिन का उजाला हो या जीवन की दोपहर दोनों ही शाम को महसूस नहीं कर सकते , इसके लिए शाम तक आना होता हैl पर,शाम की ओर बढ़ते कदम शाम को कभी नहीं देखते उन्हें तो शाम के बाद की गहरी रात दिखती हैl शाम को देखने वाला व्यक्ति दोपहर बाद और भी ऊर्जा से स्वयं को दोपहर तक वापस खींच कर ले जाना चाहता हैl पर, वह उम्र को घड़ी की सुईयों से नहीं खींच पाताl यही समय का चक्र है जो घूमता रहता है, पर कभी भी किसी को एहसास भी नहीं होने देता कि वह घूम रहा है... और ...हम आईने में खुद की चिकनी, बेदाग सूरत को देखते रहते हैं आईना नहीं बदलता ......बस...हमारी सूरत देखते ही देखते कब दागदार , खुर्दूरी, बेनूर सी लगने लगती है, हमें पता ही नहीं चलता.... यहाँ से...

किन्नर और समाज(Articale)

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 किन्नर और समाज का अंतर्सम्बंध: बदलते परिदृश्य  परिष्कार करने केl बचपन के दिनों में जाने पर मुझे दिखता है कि किस प्रकार किन्नर की तालिया की गूंज और खंजरी सड़क पर दौड़ती गाड़ी के जैसी आवाज कानों में पढ़ते ही घर के बड़े हमें घर में घर में भेज देते हैं आवाज कानों में पढ़ते ही घर के बड़े हमें घर में भेज देते यह कहकर की आ गए हैं सब देखो कितने में मानते हैंl ना तो दिखना शुरू कर देंगेl उस क्षण 'दिखाना'शब्द चरम उत्सुकता का बिंदु बन जाया करता थाl क्या दिखने लगेगा ......जो भी दिखाएंगे वह कैसा होगा ...?शायद कोई ऐसी चीज होगी जिसे हमें नहीं देखना चाहिए.....पर क्यों .....? हम क्यों नहीं देख सकते ?हम बच्चों को साहस न होता की पूछ सकें और हिम्मत ना होती है कहने की कि,हमें भी देखना हैl मां और दादी से हिम्मत का गठ्ठर लेकर पूछते तो यह पता चला कि उनके गुप्तांग के स्थान पर छिद्र होता हैl इसलिए वह न ही स्त्री हैं न ही पुरुष.....इन्हें हिजड़ा कहा जाता है.....छक्का भी इन्ही को कहते हैंl इससे अधिक न किसी ने कुछ बताया और ना पूछने की हिम्मत होतीl              जिन प्रश्न...

Story-मोह (Moh)

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पिंजरे में रहना किसको पसंद है..?किसी को नहीं।कोई नहीं चाहता कि वह पिंजरे में कैद रहे,पर कभी-कभी हम अपने आप को खुद में ही कैद करके रखते हैं । इस तरह से कैद करके रखते हैं कि हम बाहर आने के लिए तड़पते हैं और पिंजरे की सलाखें पतले धागे  जितनी कमजोर होते हुए भी तोड़ नहीं पाते।बहुत ही कमजोर होती है उसकी सलाखें कोई भी हल्के से दबाव से तोड़ सकता है पर वह टूटा नहीं । पता नहीं क्यों लगता है कि सब तोड़ ताड़ करके सब बाहर निकल जाओ । पर एक पल के लिए यही सोचती हूं कि बाहर क्या मिलना है...?आकाश...यह दूर तलक पहले धरती अपना मन,अपने नदी,अपने किनारे,अपने घर में अपने आंगन की चिड़िया....  सब कुछ तो अपना रहे हो फिर किसी और की जरूरत को कैसे पूरी होगी वह तो कहीं ऐसे नहीं मिलने की कहानी फिल्मों की तरह कहीं  वह मिल जाए कहीं भी भटक जाए.....जैसा की फिल्मों में होता है कि हीरो जो है अचानक हीरोइन के सामने आ जाता है यही हीरोइन करते उलझ कर हीरो के गोद में आ जाती हैl ऐसे दृश्य और ऐसे वाक्य रियल लाइफ में नहीं होते रियल लाइफ बहुत ही रियल होती हैl इतनी रियल होती है कि जहां हमारी कल्पनाएं काम नहीं करती हैं वह...

महाकाल दर्शन (Mahakal darshan)

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 सत्यम शिवम सुंदरम.....संयोग बस अचानक से बन जाते हैं ये मैंने अक्सर महसूस किया हैl मन में वर्षों से था कि उज्जैन जाऊंगी तो द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एक महाकाल  के दर्शन करूँगीl ऐसा सुंदर संयोग  बना कि बिना किसी पूर्व तैयारी के हम उज्जैन के लिए निकल पड़े .......क्षिप्रा नदी तट पर बसे उज्जैन नगरी को महाकाल की नगरी के रूप में भी जानते हैं l महाकाल शिव की नगरी जहां पत्ते पत्ते पर शिव है,फूल फूल पर शिव है,वह फूल चाहे सफेद हो....धतूरे के हो गुलाब के हों....गेंदे के हों.....बेलपत्र हो.....जो भी जहां भी हम देखते हैं ,वहां शिव ही शिव नजर आते हैंlउज्जैन में बहती शिप्रा नदी और शिव दोनों को ही हम महसूस कर सकते हैं l सुबह-सुबह सूर्य जब उदित होता है वहां सूर्य की किरणों के साथ शिवा की ज्योति प्रकट होती है और हर एक किरण मन को मोहित करती l है शिव जहां है वहां उनका पूरा परिवार भी हमें दिखता है मां पार्वती श्री गणेश कार्तिकेय हर कोई उनके आसपास रहता हैl शिव कभी अकेले वास नहीं करते जिस मंदिर में भी रहते हैं वहां उनका परिवार उनके साथ रहता हैl नंदी द्वार पर प्रहरी की तरह रहते हैंl उज्जैन ...