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अपनी ओर

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 पाँव के छाले कहते हैं,रुक जाओ अब आगे न बढ़ो आंखों में आंसू चुभते हैं,मंजिल को मुझे परे रखो अंतर्मन का संग्राम -सघन,बन राह का पर्वत रोकेंगे कहने वाले, सुनने वाले,घावों को बहते देखेंगे घनघोर निराशा के बादल,तुमको न सफल बनने देंगे पीड़ाओं की ये आबादी,पथ में कांटे बिखरा देंगी मिलेंगे बहुत समझाने वाले,चलते-पथ से भटकाने वाले  अपना मन बहलाने वाले, बीच अधर लटकाने वाले आसान न होगी एक डगर,रुकना नहीं है तुमको मगर  उल्टी धारा में उतरे तो,मौजों की उंगली तोड़ो तो, यह तुम पर ताने कसने वाले,तुमसे ही मिलने आएंगे सब राग द्वेष को भूल भाल, बस एक राग में गाएंगे संघर्ष शिशिर का सूरज है,जुगनू मन वाले क्या जानें  तुमने जो तप से साध लिया,ये मूल्य कोई क्या पहचाने तुम शोक -सोच को परे धरो,मन में लिए मशाल बढ़ो लघुता- जड़ता से निकलो तो,अपनी आभा को परखो तो  सब तूफानों की राह बदल,तुम भीग चुके अब बरसों तो                                ...