आज हम जिस माहौल में रह रहे हैं और जी रहे हैं वह कहीं ना कहीं हमारे अंतर्मन को छू नहीं पा रहा है। कड़ाके की ठंड गहरी धुंध जैसी लगने वाली कोहरे वाली सर्दी पेड़ -पौधे की जंतु सब कुछ ऐसे लगता है जड़ हो गए हैं। कोई क्रिया प्रतिक्रिया नहीं आज रास्ते में आते समय मौसम इतना भयानक कि आगे राह नहीं धुंध सा कोहरा, जिसमें सब कुछ गुम हो रहा था। पेड़-पौधे ही नहीं, सब कुछ खोया खोया सा। सोच रही थी कि आगे किसी और गाड़ी के पीछे हो लूँ पर, चार कदम दूर दिख नहीं रहा था। जीव जंतु छोटे-छोटे पौधे और ठंड की मार से काले पड़े पत्ते, झूलते हुए पौधे सारे पेड़ों में जैसे एक अजीब सी जकड़न ठिथुरन देखी जा सकती थी।

             विद्यालय की बाउंड्री पर यह बैठे हुए बंदर इनकी बैठने के तरीके को देखें एक दूसरे से चिपके हुए खुद को कड़ाके की ठंड से बचाते हुए। हम मानव हैं हमने अपने बौद्धिक बल पर कितनी प्रगति कर ली है। ठंड से बचने के उपाय हैं हमारे पास गर्मी से बचने के उपाय हैं हमारे पास,बारिश से बचने के उपाय हैं हमारे पास पर यह जीव जंतु जो खुले आसमान के नीचे अपने आप को इस तरह से सुरक्षित करने की कोशिश करते हैं।सर्दी में खुद को गर्माहट से भरने के लिए एक दूसरे से चिपक जाते हैं। गर्मी अत्यधिक गर्मी में दूर-दूर विकल होकर घूमते हैं बारिश में पेड़ों के नीचे पत्तों के नीचे पेड़ों की पत्तों के नीचे। थिठुरे से यह जीव जंतु कहीं कोने में दुखी हुए जीव जंतु,अपनी बिलों से झांकते हुए यह जीव जंतु। मानव कितना अलग है पशु समाज से हमारे पास हमारी भाषा है, भोजन है भवन है, भ्रमण है। सब कुछ है पर उनके पास क्या है कुछ समता, क्या समता है?संवेदनाओं की, दुख की,समानुभूति की,हम सब दुख दर्द तकलीफ से बचना चाहते हैं।

             किसी भी अवस्था में हो खुद को सुरक्षित रखना चाहते हैं।संवेदनाएं हैं।यह संवेदनाएं कहीं ना कहीं हमें एक दूसरे से जोड़ती हैं मानव को मानव होने का एहसास दिलाते हैं जाहिर सी बात है इस संसार में जितने भी जीव जंतु हैं हम उन्हें सुरक्षित नहीं रख सकते।यह संभव नहीं है कुछ प्रतिशत में कुछ जीव जंतुओं को हम संरक्षण प्रदान कर सकते हैं रख सकते हैं लेकिन ऐसे जीव जंतु जो संरक्षण रहित हैं उनके लिए इस प्रकृति ने क्या व्यवस्था करके दी है की उन्हें इतना ज्ञान है की किस प्रकार से हमें अपना जीवन यापन करना है खुद की सुरक्षा कैसे करनी है यह उन्हें कोई बताने नहीं जाता।जितने भी जीव जंतु हैं अगर वह रास्ते में चल रहे हो उन्हें लगे कि उन्हें खतरा है किनारे हो लेंगे दूर हट जाएंगे ठीक है हमला कर देंगे लेकिन हम मानव क्या करते हैं उन्हें कहीं ना कहीं बेजुबान समझ कर प्रताड़ित कर देते हैं जैसे लगता है कि उन्हें दर्द का एहसास ही नहीं होता हम स्वयं को इतना सक्षम बना चुके हैं कि मानवता कहीं ना कहीं लुप्त होती जा रही है। इन  पंक्ति में बैठे हुए बंदरों को यदि कोई डंडे से मार कर भागता है तो उसे क्या कहा जाएगा वह तो बेजुबानों को प्रताड़ित करेगा न? कितने ही जीव जंतु हैं जिस ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता कि वह कैसे जीते हैं कैसे रहते हैं कैसे खाते हैं कैसे पीते हैं हम कभी सोचें तो यदि हम होते उनकी जगह तो क्या करते?

                      Dr Sangita 


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