सारस सा मन

 



उत्सव और विलाप जीवन में एक साथ देखना हो तो वाराणसी के घाटों को देखें। आँखों में और भी मोह पसरता जायेगा इस नश्वर जीवन के लिए। कभी -कभी  मन युँ उदास उजड़ा सा जड़ होना चाहेगा कि नग्न सत्य के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आएगा।

      जैसे प्रेम में डूबा हृदय उबरना नहीं चाहता और प्रेम का अंत किसी की आँखों में देख प्रेमी हृदय जीना नहीं चाहता। फिर भी प्रेम से लोग उबर जाते हैं या ऊब जाते हैं और नहीं जीने वाला प्रेमी मन भी खुद को मरने नहीं देता। उन दो इंसान को कभी देखा है जो असीम प्रेम में बंधे होते हैं लगता है कि एक दूसरे से विलग हो जी नहीं पाएंगे।उनमें से सिर्फ एक सारस सा होता है और एक  सारस सा दिखने वाला होता है। वो साथ जीने- मरने की कसमें भी खाते हैं।फिर भी, विलग होने की स्थिति में एक थोड़ा समझदार प्रेमी स्वयं को समाज का हिस्सा मानते हुए समाज की सुनकर किसी अन्य के साथ जुड़ जाता है और दूसरा उसे किसी और से जुड़ता देख तड़प कर मर जाता है। यह दुनिया की रीत है ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे और साथ जान देने के किस्से भी मिल जायेंगे।

    मोह से तड़पते किसी ऐसे प्रेमी को देखें जो अपने प्रेमी को अन्य में संलिप्त पाता है।उसे उस समय जीवन का सत्य नजर नहीं आता। अंत सामने देख कर मोह और भी जकड़ता है। यह उसके शरीर और स्थूल अस्तित्व के प्रति होती है सारस सा प्रेमी मन इसे कभी समझ नहीं पाता। इसीलिए तो वह अपने साथी के वियोग में प्राण त्याग देता है। जीवन का परम सत्य वह कभी नहीं देखना चाहता।

       इतना समझदार और विदेह कोई कैसे बने कि संसार में रहते हुए भी वह संसार में न रहे? कितना कठिन है स्वयं को इस मोह की मायानगरी से निकलना। ये माया असंख्य हाथों से पूरे बल से अपनी ओर खिंचती है।

                                                                                                  -डॉ. संगीता, लखनऊ 

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