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नदी सी (like river) short story

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मीरा ने अपनी सारी सही करते हुए अतुल की ओर देखा। उसके देखते ही अतुल नजरें चुराते हुए ...फिर अचानक से उसपर झपटते हुए कहा,अब अपना रोना - धोना लेकर मत बैठ जाना, मैं तुम्हारी तरह फ्री नहीं बैठा हूँ।तेज कदमों से वह बाहर निकल गया। अकेली मीरा आईने में खुद को इस हाल में देखकर फिर रोने लगी.....रोते हुए खुद को शीशे में देखना क्या होता है यह वही समझ सकता है जो किसी के लिए रोया हो....उसकी आँखों के आँसू आँखों को खाली कर चुके थे पर उसकी बातें जो आईने को बता रही थी मीरा क्यों रोती हो और कब तक .....औरत एक नदी के जैसे होती है उसकी अपनी कोई जमीन नही होती जिधर भी थोड़ी ढलान मिली उधर ही बढ़ने लगती है। वो चाहे उसका रिश्ता हो या दिल की हसरत उसकी निर्मलता से किसी को कुछ भी लेना देना नही होता लोग उसे बस उपभोग की ही वस्तु समझते रहते हैं।नारी कभी समझ ही नही पाती कि पुरुष तो बस उसका उपभोग करना जानता है। जिस नारी ने एक से अधिक लोगों से सम्पर्क बनाया लोग उसे चरित्र हीन समझ कर उससे खिलवाड करने लगते हैं।वहीं अपनी बीबी को ही सबसे चरित्रवान समझते हैं, चाहे वह उनके पीठ पीछे कुछ भी करती हो। पुरुष को अपना बच्चा ही प्यारा ...

आज कल यूँ ही (these days just like this) story

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अपने आपको शीशे में देखकर यूँ लगता है कि अभी  वो हँसी मेरे चेहरे पर खिल जायेगी जो कभी मेरे चेहरे पर फिरती रहती थी। पर.. ऐसा तो कुछ भी नही है जो मैं अपने आस -पास खिलता हुआ देखूँ इन कलियों के अलावा। आज भी वो कुछ अनकहे शब्द मेरे मन मस्तिष्क को छेड़ते हैं। अस्मि अपने मन को ही समझाने  लगी।इधर मोह अपने आपसे बातें करती ही जाती है थकती ही नही। कुछ भी हो जाए ड्राइव करते हुए भी वह कहीं और ही सफर करती रहती है कितनी ही बार वो बची है लड़ने -भिड़ने से वही जानती है फिर भी वह सुधरती नहीं। बोलती है मैं अब सुधर कर क्या करूँगी ये बिगडैल ऐसे ही कितनी अच्छी लगती है।अस्मि भी तो अब कुछ नही कहती। कह कह कर तो वह थक चुकी है कि शादी की उमर बीती जा रही है बहना मेरी छोड़ तू अपनी तो जिंदगी सुधार ले। पर नही ,वह सुने तब तो।              मोह किसी से कुछ नही कहती पर सुनती सबकी है। सुनकर अनसुना करना भी उसे खूब आता है। पर अपनी बहन की वह हमेशा सुनती है... कहानी। आज फिर बहन से लिपट कर मोह उसकी जिंदगी के कुछ पन्ने खोलने के लिए विवश करने लगी। अस्मि को भी अपनी कहानी अपने पर बीती कहान...

Love is love(प्यार तो प्यार है) story

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 अंशिका की आवाज की गहराई वह क्या समझे।अंशुमन मैं.... तुम्हारी तस्वीर बार बार देखती हूँ और हर एक याद से जुड़ती हूँ।तुम चाह कर भी वो लम्हे लौट नहीं सकते,तो एक नया लम्हा ही बना दो।कम से कम इसी बहाने तुम साथ तो रहोगे।मुझसे जुड़े तो रहोगे।अंशिका की मनुहार सुने बिना ही अंशुमन् ने उससे मुह फेर लिया।उसे उसके जीवन का नया पड़ाव जो मिल रहा था।उसके लिए तो हर सफर में में एक सराय मिल ही जाता है।उसे कहाँ एहसास है कि सराय घर नही हुआ करते।.....​आज तुम्हें फर्क नही पड़ता कि मैं तुमसे दूर हो रही हूँ, कल वापस आना पड़ा तो क्या तुम मुझतक पहुँच पाओगे ...?तुम्हारे कदम आगे बढ़ रहे हैं और पीछे के रास्ते मिटते जा रहे हैं।आने वाले दिनों में कोई ऐसा न होगा जो मेरी कमी पूरी कर देगा।वो तुम्हें समझ में आएगा ,पर अभी नही।तुम दूर तक सफर कर लो, हो सकता है कोई बेहतर मिले।अंशुमान को अपने से दूर जाते हुए रागिनी भरे आँसुओं से देखती है।पर,रोक नही सकती।....तुम मेरी कातिल हो ,मेरे दिल की कातिल हो,तुम्हारे जैसा पत्थर मैंने नहीं देखा था।तुम मेरी ज़िंदगी मे क्यों आई जब तुम्हे जाना ही था ,तुम किसी की नही हो सकती हो,तू जिंदगी में अकेली...

Public Public...लोग और लोग good think

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 काफी समय से एक बात मन में बादल की तरह उमड़- घुमड़ रही थी। परिवर्तन प्रकृति का नियम है, वह बदलती रहती है, शाश्वत सत्य अटल रहता है। मानव का एक बहुत बड़ा सत्य है कि वह दूसरों का बदलना बहुत नोटिस करता है और उसी के अनुसार व्यवहार करता है। यहाँ विशेष रूप से मानव के शरीर की बात की जाए तो शिशु मानव  वत्सल भाव जगाता है,बालपन की कोमलता हृदय को आह्लादित करता है, किशोर मन की हलचल जहाँ अगले को महसूस होने लगती है, युवा हृदय जहाँ से अनुराग, आसक्ति और आजीविका के पथ पर अग्रसर होने लगता है वहीं से मानव अपने चरम को छूता हुआ जीवन की साँझ की ओर बढ़ने लगता है।           मानव शरीर में होने वाले परिवर्तन दूसरों के मन पर प्रभाव डालते हैं। आकर्षक व्यक्ति अनायास ही सामने वाले के नेत्र बाँध लेता है। पर शरीर के आकर्षण से बँधे लोग आकर्षण हीनता को स्वीकार कर पाने में असमर्थ होते हैं। यह मैं स्वयम् के अनुभव से जोड़ती हूँ।कुछ समय पहले तक मैं शरीर से ठीक- ठाक नजर आती थी, लोग मेरी तारीफ़ पर तारीफ़ करते थे, फिर मैंने थोड़ा सेहत को ढील दे दी और दोहरे शरीर की नजर आने लगी। मुझे विश्वा...

करीने से....

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 जब आपकी तकलीफ से सामने वाले को तकलीफ न होकर ये खुशी हो कि....आपके लिए वो कितना पागल है....तो समझ जाना चाहिए कि सामने वाले का अहंकार आसमान पर है  अवसाद कभी भी अचानक से नहीं उभर आता....वह जमता रहता है आँखों में,मन की खोह में,अदृश्य दैत्य सा चारो ओर घूमता रहता है...पर महसूस कराता रहता है..नींद की राहें रोककर खड़ा हो जाता है....जब तक सबके सामने आता है तब तक सबकुछ गवां चुका होता है इंसान अपना सबकुछ  जब आपकी तकलीफ से सामने वाले को तकलीफ न होकर ये खुशी हो कि....आपके लिए वो कितना पागल है....तो समझ जाना चाहिए कि सामने वाले का अहंकार आसमान पर है  कभी -कभी हमें कोई राह नहीं सूझती ...हम अपने बनाये रास्तों में खुद ही उलझ कर रह जाते हैं जिंदगी वह नहीं जिसे हम अपने हिसाब से अपनी जरुरतों को देखते हुए पूरा करना चाहते हैं यह किसी पेनड्राइव में सुरीले मनचाहे गाने भर लेने जैसा नहीं है यहाँ तो जिन्दगी रेडियो की तरह बजती है जहाँ जो गाने बजे उसे सुनकर आनंदित होना होता है या फिर  चैनल बदल लेना होता है...आप कोई भी चैनल चलाओ पर उसके तो प्रोग्राम फिक्स होते हैं....कभी कभार ही आपका पसन्दी...

स्वप्न लोक नहीं यह

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 छोड़कर चले जाने के हजारों बहाने हैं पर दिल एक वजह से रुक जाता है....कि मिल जाएगा बहुत कुछ पर इतना न मिलेगा.....बहुत कुछ और एक में एक चुन लेना मुश्किल नहीं है....मुश्किल यह है कि उस एक ने बहुत कुछ चुन लिया ...     बहुत मुश्किल है किसी ऐसे को भूलना जिसे आप जीवन भर सहेज कर सम्भाल कर रखना चाहते हों..लेकिन यह भी सच है कि वो इंसान आपकी कदर कभी नहीं करेगा जिससे आप उम्मीद लगाए बैठे हों....आज ही नहीं कल ही नहीं मानव के अस्तित्व में आने के बाद से जिस भाव ने किसी दो को एक किया था ...वह प्रेम था....जिसके अभाव में जीवन निरर्थक है 

"Kuch Baten ....Bikhri Bikhri Si"

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 1सोशल मीडिया.....देखा  जाए तो आपकी दिनचर्या और आपके भीतर चल रहे,सवालों और बदलावों का आईना भी होते हैं। उसी में एक है बार- बार या लगभग रोज ही अपनी स्टेटस प्रोफाइल पिक्चर बदलना।वो भी तब ....जब आप स्वयं को बहुत व्यस्त दिखाते हों। जो कि, यह दर्शाता है कि आप अपने व्यक्तित्व को किसी खास उद्देश्य से ही दिखाना चाहते हैं। ...उद्देश्य तो देखने वाला समझ ही जाता है। एक  तरह से सोशल साइट्स आपकी हरकतों की पोल खोलते रहते हैं।  2  जब कोई किसी को काल करता है तो वह सुकून चाहता है. पर जब कोई किसी. के लिए कुछ लिखता है तो अपने आप को लिखता है  3  आज एक बात और सीखी मैंने सच बर्दाश्त करना मुश्किल होता है.जबकि झूठ के साथ ऐसा नहीं है उसमें पाचक रस बहुत होता है बातों को बहुत जल्दी पच जाता है. किसी सच्चे इंसान से पूछो कि झूठ को निकलना भी कितना मुश्किल होता है   4 सब कुछ वक्त पर छोड़ देने से वक्त बदल नहीं जाता,बदलना पड़ता है  5 जब कोई पास रहने वाला दूर होने लगता है तब उसकी करीबी का हमे पता चलता है।किसी की मौजूदगी जब आपको अपने होश में न रहने दे त...